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क्या क़ुरआन (नाऊज़ोबिल्लाह)मुहम्मद साहब द्वारा रचित ग्रंथ है?

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नहीं, क़ुरआन मुहम्मद साहब द्वारा रचित ग्रंथ नहीं है। क़ुरआन इस्लामी धर्म का पवित्र ग्रंथ है और मुस्लिम समुदाय की मान्यताओं के अनुसार, यह अल्लाह (ईश्वर ) के माध्यम से प्रकटित हुआ है। मुहम्मद साहब को इस्लामी विश्वास मानने वाले मुसलमानों का प्रमुख प्रेरक मानते हैं, लेकिन वह क़ुरआन के लेखक नहीं हैं। मुहम्मद साहब के विषय में मान्यता है कि उन्हें अल्लाह के द्वारा दिए गयी आकाशवाणी  के माध्यम से क़ुरआन की प्राप्ति हुई थी।  क़ुरआन को अल्लाह के माध्यम से आकाशवाणी के द्वारा अवतरित हुआ माना जाता है, जिसे मुहम्मद साहब ने अपने जीवनकाल में प्राप्त किया। यह घटना मुसलमान समुदाय के धार्मिक अनुयायों के बीच प्रमुख तथ्य मानी जाती है। कुरान के अवतरण का पूर्ण विवरण इस प्रकार है: जब मुहम्मद साहब 40 वर्ष के थे, वह हिरा नामक गुफ़ा में जाकर एकांत में ईश्वर की स्तुति वंदना किया करते थे। एक दिन उन्हें गुफ़ा में अचानक एक आकाशीय दृश्य दिखाई दिया। इस दृश्य में उनके सामने मानव के रूप में दिखाई देने वाले  अल्लाह के अल्लाह के देवदूत गैब्रिएल थे, जिन्होंने उन्हें पढ़ने के लिए आह्वानित किया। पर मुहम्मद साहब ...

क्या मुसलमान हिन्दुओं व अन्य धर्मो के लोगो को काफिर समझते हैं

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  इस्लाम  धर्म के विषय में एक प्रमुख भ्रान्ति यह भी प्रचलित है कि  इस्लाम को मानने वालों की दृष्टि में दूसरे धर्मो को मानने  वाले विशेष रूप से हिन्दू काफिर होते हैं। जबकि यह वास्तविकता नहीं है।  जाहिल मुसलमानों  की बातों को तो रहने ही दीजिये उन्हें तो अपने मज़हब के ककहरे का ज्ञान नहीं होता वे तो क्षमा योग्य हैं।  पर आजकल के बहुत से पढ़े लिखे मुसलमान भी हिन्दुओं को काफिरों का पर्यायवाची समझने लग गए हैं। देखिये यह सत्य है कि  इस्लाम धर्म और हिन्दू धर्म एक दुसरे के बिलकुल विपरीत हैं।  अर्थात एक धर्म  ( हिन्दू धर्म ) सनातन संस्कृति अर्थात देवी देवताओं के पूजा पाठ में विशवास व्यक्त करता है तो वहीँ दूसरा धर्म( इस्लाम धर्म) देवी देवताओं के पूजा पाठ का पूर्ण रूप से खंडन करता है और देवी देवताओं के पूजा पाठ को नरक का द्वार बताता है।  परन्तु इसका यह अर्थ भी कदापि नहीं की एक मुसलमान को काफिर, मुशरिक, व मुनाफ़िक़ में अंतर नहीं मालूम होना चाहिए। इस्लाम के अनुसार काफिर किसे कहते हैं? इस्लाम धर्म के अनुसार काफिर वो है जो ईश्वर के अस्तित्व को सिरे से ही...

क्या इस्लाम धर्म दूसरे धर्मो का विरोध करता है?

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  इस्लाम धर्म के विषय में एक प्रमुख भ्रांती यह है की इस्लाम धर्म अन्य धर्मों का विरोधी है ।पर इस भ्रान्ति का सत्यता से कुछ भी लेना देना नहीं है।इस्लाम धर्म शायद संसार का एकमात्र धर्म है जो सहिष्णुता की शिक्षा देता है। क़ुरआन की आयतों के अनुसार सारे पैग़म्बर ईश्वर की ओर से ही भेजे गए हैं। इसलिए धर्मावलम्बी चाहें किसी भी धर्म का मानने वाला क्यों न हो उसे प्रत्येक धर्म, उस धर्म से सम्बंधित ईश्दूत, विभिन्न धर्मो के धार्मिक ग्रंथों को सम्मान देना होगा। क़ुरान की आयात  - " आमन्तो  बिल्लाहि व मलाइकतिहि व कुतुबिहि व रुसूलिहि---------" इस कथन की तस्दीक़ करती है। अर्थात मैंने विश्वास किया सभी देवदूतों पर, सभी धर्मग्रंथों पर, सभी ईश्दूतों पर-- --" यदि कोई मुस्लिम इस आयात को मानने से इंकार कर दे तो वह इस्लाम विरोधी  है। स्वतंत्रता व धार्मिक स्वतंत्रता:  इस्लाम धर्म के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया गया है। हदीसों के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता का हनन मौलिक अधिकारों का हनन है। किसी को भी जबरन इस्लाम धर्म क़ुबूल करने पर मजबूर नहीं किया जा सकत...