क्या क़ुरआन (नाऊज़ोबिल्लाह)मुहम्मद साहब द्वारा रचित ग्रंथ है?
The religion of Islam is supposed to be the religion of terror and horror but the fact is just reverse of it. The purpose behind this Blog is to show people the real face of Islam. Advent of Islam is linked with a noble purpose that is to stop terrorism and maintain peace in the region. Islam has never been against any religion. Thanks!
इस्लाम धर्म के विषय में एक प्रमुख भ्रान्ति यह भी प्रचलित है कि इस्लाम को मानने वालों की दृष्टि में दूसरे धर्मो को मानने वाले विशेष रूप से हिन्दू काफिर होते हैं। जबकि यह वास्तविकता नहीं है। जाहिल मुसलमानों की बातों को तो रहने ही दीजिये उन्हें तो अपने मज़हब के ककहरे का ज्ञान नहीं होता वे तो क्षमा योग्य हैं। पर आजकल के बहुत से पढ़े लिखे मुसलमान भी हिन्दुओं को काफिरों का पर्यायवाची समझने लग गए हैं। देखिये यह सत्य है कि इस्लाम धर्म और हिन्दू धर्म एक दुसरे के बिलकुल विपरीत हैं। अर्थात एक धर्म ( हिन्दू धर्म ) सनातन संस्कृति अर्थात देवी देवताओं के पूजा पाठ में विशवास व्यक्त करता है तो वहीँ दूसरा धर्म( इस्लाम धर्म) देवी देवताओं के पूजा पाठ का पूर्ण रूप से खंडन करता है और देवी देवताओं के पूजा पाठ को नरक का द्वार बताता है। परन्तु इसका यह अर्थ भी कदापि नहीं की एक मुसलमान को काफिर, मुशरिक, व मुनाफ़िक़ में अंतर नहीं मालूम होना चाहिए।
इस्लाम के अनुसार काफिर किसे कहते हैं?
इस्लाम धर्म के अनुसार काफिर वो है जो ईश्वर के अस्तित्व को सिरे से ही नकार दे अर्थात ईश्वर नामक किसी सत्ता में विश्वास ही न करे। इस तरह से यदि देखें तो हम पाएंगे की कुफ्र या काफिर होना कोई धर्म का भाग नहीं बल्कि यह हमारी सोच आधारित होता है। आप अपने आस पड़ोस में ऐसे अनेकों उदहारण देख सकते हैं कि व्यक्ति का जन्म हिन्दू परिवार में हुआ और बड़ा होकर उसने ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करना छोड़ दिया इस प्रकार उसने कुफ्र को आत्मसात कर लिया।
इस्लाम के अनुसार मुशरिक किसे कहते हैं ?
इस्लाम के अनुसार मुशरिक वह है जो एक ईश्वर के अतिरिक्त उस जैसा किसी अन्य को समझे या ईश्वर जैसा सम्मान प्रदान करे। सनातन संस्कृति को मानने वाले हिन्दुओं को मुशरिक इसलिए कहा जाता है क्यूंकि वे बहुदेववाद में विशवास करते हैं तथा देवी देवताओं को ईश्वर जैसा या कभी कभी ईश्वर से भी अधिक सम्मान देते हैं। अक्सर बहुदेववादी कहते दिखाई देते हैं- "आप तो हमारे भगवान् हैं बल्कि उससे भी उच्च हैं।" इस्लाम धर्म ने बहुदेववादियों के इसी कथन को शिर्क माना है। क्योंकि एकेश्वरवादियों के अनुसार ईश्वर स्वयं में अद्वितीय है, उस जैसा कोई अन्य नहीं न ही शक्ति में और न ही सामर्थ्य में। इसलिए इस्लाम धर्म के अनुसार मुशरिक वह है जो शिर्क करे अर्थात ईश्वर का साझीदार किसी अन्य को बनाये और सभी बहुदेववादी धड़ल्ले से ऐसा करते हैं। इसलिए बहुदेववादी इस्लामी मान्यता के अनुसार काफिर नहीं बल्कि मुशरिक हैं।
इस्लाम के अनुसार मुनाफ़िक़ कौन है?
इस्लाम धर्म के अनुसार मुनाफ़िक़ का सम्बन्ध भी एक सोच से है। अर्थात जो व्यक्ति तुष्टिकरण की नीति का अनुसरण करे व धोखा देने की प्रवृत्ति को अपनाये वह मुनाफ़िक़ है। अर्थात यदि कोई व्यक्ति स्वयं को मुसलमान घोषित करे पर उसका व्यवहार इस्लाम धर्म की मान्यताओं के अनुरूप न हो तो वह मुनाफ़िक़ है। जैसे यदि कोई मुसलमान कहे कि वह मुसलमान तो है पर वह मंदिर भी जाता है और पूजा भी कर लेता है तो इस्लामी मान्यता के आधार पर वह मुनाफ़िक़ है। इसी प्रकार यदि कोई हिन्दू यह कहे की वह हिन्दू तो है पर कभी कभार नमाज़ भी पढ़ लेता है तो वह हिन्दू भी मुनाफ़िक़ है. मुनाफ़िक़त का अर्थ हुआ आम जनमानस को धोखा देना अर्थात जो नहीं हो उसकी एक्टिंग करके लोगों को मूर्ख बनाना व झूटी वाहवाही लूटना। मुनाफ़िक़ को कपटाचारी भी कहते हैं। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद जैसे आतंकवादी समूहों के सभी लोग इस्लाम धर्म के अंतर्गत मुनाफ़िक़ माने गए हैं क्यूंकि यह सभी स्वयं को मुसलमान घोषित करते रहे हैं जबकि यह मुसलमान हैं ही नहीं।
क्या मुसलमानो को हिन्दुओं व अन्य धर्मों के लोगों को काफिर समझना चाहिए?
इस प्रश्न का उत्तर नहीं में होना चाहिए। मुसलमानो को पहले अपने गरेबान में झाँक लेना चाहिए। केवल मांसाहारी भोजन कर लेने या मुर्ग़े की टांग खींच खींच कर खा लेने से कोई मुस्लमान नहीं हो जाता। दुसरे धर्मो के लोगों पर ऊँगली उठाने से पहले मुसलमानो को अपनी स्तिथि की जांच कर लेनी चाहिए। बहुत से मुसलमान तुष्टिकरण की नीति को अपनाते दिखाई देते हैं क्या यह सब मुनाफ़िक़त नहीं है? और तो और मुसलमान दरगाहों, मज़ारों पर जाकर मत्था टेकते हैं यह सब शिर्क नहीं तो और क्या है। अर्थात गुड़ खाओ और गुलगुले से परहेज़ की नीति का मुसलमान अनुसरण करते दिखाई दते हैं। बहुत से मुसलमान अज्ञानता के कारण कुफ्र और शिर्क स्वयं करते हैं और ऊँगली उठाते हैं दुसरे धर्मो के लोगों के ऊपर। इसलिए कोई भी पढ़ा लिखा ज्ञानी मुसलमान सभी हिन्दुओं या दुसरे धर्मो के लोगों को काफिर मुशरिक नहीं समझता और ऐसा समझना भी नहीं चाहिए। संसार का कोई भी व्यक्ति जबतक काफिर- मुशरिक के अनुरूप व्यव्हार न करे तबतक उसे काफिर-मुशरिक की संज्ञा देना इस्लाम धर्म में बहुत बड़ा गुनाह माना गया है ।
क्या सभी हिन्दू या ईसाई काफिर होते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर है नहीं । सभी हिन्दू, ईसाई या अन्य धर्मो के लोग ज़रूरी नहीं है कि काफिर या मुशरिक ही हों। अगर उनकी सोच एक ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करने की है तो उन्हें काफिर या मुशरिक कैसे कहा जा सकता है? जैसे - स्वामी विवेकानंद व स्वामी दयानन्द सरस्वती। इन्होने तो हिन्दू धर्म की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठायी और हिन्दू धर्म को शुद्ध करने का प्रयत्न किया। इस्लाम धर्म के अनुसार स्वामी विवेकानंद व स्वामी दयानन्द सरस्वती हिन्दू हैं पर काफिर या मुशरिक नहीं हैं बल्कि ईमान वाले हैं तथा इनके लिए नरक की अग्नि हराम है। इसी प्रकार केवल वे ईसाई ही मुशरिक हैं जो मसीह बिन मरियम को ईश्वर पुत्र मानते हैं तथा उन ईसाइयों को मुशरिक नहीं कहा जा सकता जो ईसा मसीह को ईश्वर द्वारा कृत मरियम का पुत्र मानते हैं और उन्हें ईश्वर पुत्र नहीं मानते।
निष्कर्ष:
निष्कर्ष स्वरुप कहा जा सकता है कि काफिर वह है जो ईश्वर को न माने, मुशरिक वोह है जो ईश्वर को तो माने पर उसके समकक्ष अन्य को भी माने, ममुनाफ़िक़ वोह है जो स्वयं को ऐसा प्रदर्शित करे जो वोह स्वयं नहीं है। अधिकतर भारतीय हिन्दू काफिर न होकर मुशरिक हैं अपने बहुदेववादी दृष्टिकोण के कारः। ऐसे ही बहुत से ईसाई भी मुशरिक हैं ईसा मसीह को ईश्वर पुत्र बताने के कारण, कुछ तथाकथित मुसलमान भी मुश्रिकाना कृत्यों में लिप्त हैं मज़ारों पर जाकर मत्था टेकने, मुस्लिम संतों को ईश्वर तुल्य समझने की भूल करने के कारण। कुछ तथाकथित मुसलमान मुनाफ़िक़त में भी लिप्त हैं अपनी कट्टरवादी सोच के कारण क्योंकि इस्लाम धर्म में कट्टरवाद को कोई स्थान नहीं दिया गया है।
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